नित खोजूं
आने का कारण
पर जाने का
समय निकट
दुविधा विकट
रिश्ते थे
हम जग में
चलते हमारे
उनपर संकट
दुविधा विकट
बना बनाया
सब छुटेगा
संग क्या जाये
ये कटकट
दुविधा विकट
भेजा था
भेजा न भेजा
भेजे में भरते
रहा मै चिरकुट
दुविधा विकट
सुई से तलवार तक क्यूँ कोई जान ना पाए | शब्दों में है क्या छुपा जो घाव गंभीर बनाय||
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