गुरुवार, 29 अगस्त 2024

संभालो मुझको


तुम भरे भरे से रहते हो
बिन बोले सब कहते हो

खुश होते तब भी बहते हो 
दुःख में भी संग रहते हो 
सागर से लगे रिश्ता गहरा
छलके लगे मोती है ठहरा 
कभी मिलाई कभी जुदाई
बिन तुम्ह्रारे कभी न आई     
भोले भाले नयन हमारे
कभी कुछ न कहते हो 
निकलते और बहते हो
भीड़ है तन्हा रहते हो 
नयन बसे संग नयन रहे
संग ले न तुम बहते हो 
ईन मोतियों को कैद किया
पर आज़ाद सदा ही बहते हो 
कितना गहरा नाता तुम संग
संग आते संग ही रहते हो 

दुविधा विकट


नित खोजूं
आने का कारण
पर जाने का
समय निकट
दुविधा विकट
 
रिश्ते थे
हम जग में
चलते हमारे
उनपर संकट
दुविधा विकट
 
बना बनाया
सब छुटेगा
संग क्या जाये
ये कटकट
दुविधा विकट
 
भेजा था
भेजा न भेजा
भेजे में भरते
रहा मै चिरकुट
 दुविधा विकट 
 
 

बुधवार, 28 अगस्त 2024

अभिनेत्री हूँ


तालिओं की गडगडाहट
लोगो की वाहवाही
बिजली की चकाचोंध
चमक के बीच
मंच पर खड़ी
मै, एक अभिनेत्री
मेरा घर है ये मंच
ये दुनिया परिवार
लेकिन
मंच की दुनिया से बाहर
मै एक तमाशा
मेरा बिखरा हुआ परिवार
मुझसे दूर बहुत दूर
केवल कुछ नज़रें
ललचाई सी
ताकती हुई मेरा शरीर
आ रही हैं करीब
ये समाज जो कल तक मेरे साथ था
आज क्यूँ नहीं देख रहा
मेरी किस्मत बदनसीब

मै अकेली विवश बेसहारा
ढूँढती हुई किनारा
आ पहुंची समाज में
परन्तु, ये घबरा रहा है
डर रहा है
मुझे अपनाने में
क्यूँ
 
क्या इसलिये
क्यूँ मैंने समाज के सामने
समाज का चेहरा प्रस्तुत किया
और सचाई कडवी होती है
या इसलिये की मै
ऐसे समाज में आ गई हूँ
जिसे दरिंदो का समाज कहा जाता है
या वो फूल हूँ जिसे सिर्फ पैरों तले रौंदा जाता है

मेरी भी इच्छाएं है तमन्नाएँ है
किसी की बीवी बनू
माँ बनू किसी की
क्या तुम्हारी इच्छाएंइच्छाएं हैं मेरी इच्छा कुछ नहीं
क्या मेरी दुनिया मंच की दुनिया, ये समाज कुछ नहीं

जब मेरे सर से उठा साया
मेरे बाप का
तब सब थे कहाँ
ये समाज ही तो है
जिसने मुझे पहूंचाया यहाँ
मै बनी सहारा अपनी माँ और बहिनों का
पर इस समाज ने
पहनाया ताज मुझे अपमान के गहनों का
वाह रे समाज, क्या ढंग बनाया
भाई ने ही, बहिन के नाम पर
धब्बा लगाया
कीचड़ से बचाना तो दूर
बल्कि दलदल मैं फंसाया
आज मुझे मेरा सहारा मिल रहा है
मगर समाज भटका रहा है उसकी भी डगर
तुम कुछ दे नहीं सकते, तो छीनो  तो मत
न जाने कब दूर होगी तुम्हारी हवस की ये लत
 
इससे तो मंच की दुनिया अच्छी है
जहाँ सच्चा कुछ नहीं
बहार आकर देखा
तो समाज से बुरा कुछ नहीं

मुझे गर्व है
मै एक स्त्री हूँ
जो समाज में नहीं
परन्तु मंच की अभिनेत्री हूँ

कुर्सी


 
जब आम आदमी था मै  
सब मेरे मै सबका था
याद मुझे वो दिन आता 
कुर्सी पाने मै लपका था   
 
जब से कुर्सी चाही मैंने  
बस कुर्सी ही चिपक गई 
सीढ़ी जो उपर ही लाती
चढ़ते ही वो खिसक गई 

अब न मुझको तुम दीखते 
न मुझ तक पहुंचें आवाजें 
कुर्सी वालों की दुनिया मै 
जनता के हैं बंद दरवाजे

कुर्सी की चाहत में जीना
कुर्सी की चाहत में मरना
कुर्सी पाने की चाहत में
दंगे, संग गाली और धरना
     
कुर्सी वालों की दुनिया में
अपने पराये का भेद कहाँ
नेकी से न कोई वास्ता
पर करते नेकी नेक यहाँ 

साहूकारों की खिलती बांछे
जिनका मुझ पर दावँ लगा  
मेरी जीत में जीते हैं वो
आते पाते जाते आस जगा

जिनसे नफरत सदा रही  
वो द्वार बंधे यमदूतों से
कब किसकी आई लें चलें 
हम जियें मरें यूँ भूतों से

राजीव क्यूँ चाहे कुछ करना
जब भरने का अवसर आया
तकदीर ने खोले सब ताले
भर,खाली बोरे,माणिक माया 
 
  1.  

संभालो मुझको

तुम भरे भरे से रहते हो बिन बोले सब कहते हो खुश होते तब भी बहते हो   दुःख में भी संग रहते हो   सागर से लगे रिश्ता गहरा छलके लगे मोती है ठहरा ...